नींद पर असर बढ़ा रहा है — क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहा
नयी जांच में पता चला है कि बढ़ता तापमान लोगों की नींद को भी प्रभावित कर रहा है। वैश्विक स्तर पर गर्मी के कारण औसतन हर व्यक्ति साल में लगभग 56 घंटे कम सोता है। यह प्रभाव उन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा है जहाँ रात का तापमान लगातार ऊपर जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार कम नींद से हृदय रोग, मानसिक समस्याएँ, कमजोर इम्यूनिटी और कामकाजी क्षमता में कमी जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उभर सकती हैं।
1,338 शहरों का विश्लेषण
क्लाइमेट सेंट्रल के विश्लेषण में दुनिया के 1,338 बड़े शहरों को शामिल किया गया था, जिनमें भारत के 107 शहर भी हैं। रिपोर्ट में India को उन देशों में रखा गया है जहाँ तापमान वृद्धि के कारण लोगों की नींद पर गहरा असर पड़ा है। खासकर दक्षिण भारत के नगरों में सालाना औसतन 78 से 91 घंटे तक नींद घटने का अनुमान है, जिनमें से 8–9 घंटे सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़े जा रहे हैं।
सबसे ज्यादा प्रभावित शहर और राज्य
रिपोर्ट के अनुसार तमिलनाडु उन राज्यों में सबसे अधिक प्रभावित है; यहाँ प्रति व्यक्ति क्लाइमेट चेंज से जुड़ी अतिरिक्त नींद की कमी औसतन 7.9 घंटे सालाना बताई गई है। महानगरों में चेन्नई सबसे ऊपर है, जहाँ लोग सालाना करीब 93 घंटे कम सोते हैं। मुंबई में यह संख्या लगभग 84 घंटे और कोलकाता में लगभग 80 घंटे आंकी गई है।
पहले ठंडे माने जाने वाले शहर भी प्रभावित
ऐसे शहर जो पहले तुलनात्मक रूप से ठंडी रातों के लिए जाने जाते थे — जैसे बेंगलुरु और देहरादून — अब अधिक गर्म रातों का अनुभव कर रहे हैं। बेंगलुरु में 1970 के दशक की तुलना में 2025 तक सालाना नींद का नुकसान बढ़कर 67 घंटे तक पहुँच गया; इसमें लगभग 8 घंटे की अतिरिक्त कमी सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है। देहरादून में हाल के पांच वर्षों में नींद की कमी में लगभग 10 प्रतिशत वृद्धि देखी गई है।
राज्यवार अंतर
महाराष्ट्र के 22 शहरों में रहने वाले लोगों की औसतन सालाना नींद लगभग 76.3 घंटे कम हुई है, जिसमें से लगभग 5.8 घंटे क्लाइमेट चेंज के कारण हैं। उत्तर प्रदेश के 11 शहरों में यह औसत करीब 69 घंटे है, और इसमें से लगभग 4.9 घंटे का संबंध बढ़ते रात के तापमान से जोड़ा गया है।
स्थिति बिगड़ने की चेतावनी
रिपोर्ट बताती है कि 1970 के दशक के मुकाबले तापमान वृद्धि से होने वाली नींद की कमी कम से कम दोगुनी हो चुकी है। वैश्विक स्तर पर मध्य-पूर्व के शहरों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव देखा गया है, जबकि दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्से भी गंभीर रूप से प्रभावित हैं। शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि यदि रात के तापमान में यह वृद्धि जारी रही तो आने वाले वर्षों में नींद से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ और तीव्र हो सकती हैं।