कांगो खनिज संपदा पर अमेरिका-चीन की भू-राजनीतिक होड़
अफ्रीका के मध्य में स्थित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार है, लेकिन इसकी जमीन के नीचे छुपा खनिज भंडार इसे वैश्विक शक्तियों के लिए रणनीतिक महत्व का केंद्र बनाता है। कोबाल्ट, तांबे और अन्य दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार के कारण अमेरिका और चीन के बीच यहां प्रभाव जमाने की होड़ तेज हो गई है।
कांगो की जमीन के नीचे कौन सा ‘खजाना‘ छुपा है?
कांगो की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है, लेकिन भूगर्भिक संपदा के मामले में यह देश अत्यंत समृद्ध है।
- कोबाल्ट: कांगो दुनिया में कोबाल्ट का सबसे बड़ा उत्पादक है और वैश्विक आपूर्ति का लगभग 50–70% हिस्सा यहीं से आता है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए कोबाल्ट अनिवार्य है।
- तांबा (कॉपर): यह दुनिया के प्रमुख तांबा उत्पादक देशों में शामिल है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी है।
- अन्य दुर्लभ खनिज: लिथियम, कोल्टन, मैंगनीज, टैंटलम, टंगस्टन, सोना, टिन और हीरे के भी बड़े भंडार यहां मौजूद हैं।
समस्या यह है कि परिवहन नेटवर्क (रेल और सड़क) की कमी और दशकों से चल रहे आंतरिक संघर्ष के कारण कांगो इन संसाधनों का पूरा फायदा नहीं उठा पाया है।
चीन का दबदबा: खदानों से रिफाइनिंग तक पकड़
चीन ने कांगो में लंबे समय से निवेश कर अपना प्रभाव स्थापित किया है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पश्चिमी कंपनियां जोखिम के कारण नहीं गईं।
- चीनी कंपनियां कांगो के औद्योगिक कोबाल्ट खदानों का लगभग 70–80% हिस्सा संचालित करती हैं।
- वैश्विक स्तर पर कमर्शियल ग्रेड कोबाल्ट केमिकल्स के रिफाइनिंग का 90% से अधिक और कोबाल्ट सल्फेट बाजार का 80% चीन के नियंत्रण में है।
- कच्चे खनिज निकालकर चीन उन्हें अपने देश में रिफाइन करता है, जिससे वैश्विक टेक और ऑटोमोबाइल सप्लाई चेन पर उसकी पकड़ मजबूत हुई है।
अमेरिका की एंट्री: राष्ट्रीय सुरक्षा और सप्लाई चेन विविधीकरण
चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मुद्दा बनाया है।
- लोबिटो कॉरिडोर: यह 1,300 किमी लंबी रेलवे परियोजना अंगोला के अटलांटिक तट को कांगो और जाम्बिया के खनिज क्षेत्रों से जोड़ती है। अमेरिका ने इसमें 4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश करने का वादा किया है, जबकि कुल बजट 6 अरब डॉलर से अधिक है।
- कूटनीतिक पहल: 2025 में अमेरिका की मध्यस्थता में कांगो और रवांडा के बीच शांति समझौते हुए, जिसके बाद ‘वाशिंगटन एकॉर्ड्स फॉर पीस एंड प्रॉस्परिटी’ पर हस्ताक्षर हुए।
- निवेश और साझेदारी: अमेरिकी कंपनियों को कांगो में निवेश के लिए प्राथमिकता देने हेतु ‘स्ट्रेटेजिक एसेट रिजर्व’ (SAR) की घोषणा की गई है।
9 अरब डॉलर का महासौदा: ओरियन-ग्लेनकोर डील
फरवरी 2026 में अमेरिका के समर्थन वाले कंसोर्टियम ‘ओरियन सीएमसी’ (Orion CMC) ने स्विस माइनिंग दिग्गज ग्लेनकोर के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया।
- इस 9 अरब डॉलर के सौदे के तहत ओरियन ने कांगो की दो सबसे बड़ी कोबाल्ट और तांबा खदानों—’मुतांडा माइनिंग’ और ‘कामोतो कॉपर कंपनी’ (KCC)—में 40% हिस्सेदारी हासिल की है।
- पहले मुतांडा खदान का कोबाल्ट मुख्य रूप से चीन की सप्लाई चेन में जाता था, लेकिन अब ओरियन के पास इसे अमेरिका और पश्चिमी देशों को बेचने का अधिकार आ गया है।
- यह सौदा चीन के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा है।
अन्य अमेरिकी कंपनियों की बढ़ती दिलचस्पी
- कोबोल्ड मेटल्स (Cobalt Metals): जेफ बेजोस और बिल गेट्स जैसे निवेशकों वाली इस फर्म ने कांगो के ‘मानोनो लिथियम डिपॉजिट’ को हासिल करने का सौदा किया है, जो दुनिया के सबसे बड़े लिथियम भंडारों में से एक है।
- वर्चस मिनरल्स (Virtus Minerals): इस अमेरिकी कंपनी ने दुबई स्थित केमफ (Chemaf) से कांगो के तांबा और कोबाल्ट खदानों को खरीदने का समझौता किया है।
कांगो के लोगों के लिए क्या मायने रखता है?
भले ही अमेरिका और चीन के बीच कांगो के खनिजों पर वर्चस्व की जंग तेज हुई है, लेकिन स्थानीय आबादी के लिए स्थिति में बड़ा सुधार अभी स्पष्ट नहीं है।
- पूर्वी कांगो में M23 जैसे विद्रोही समूहों की हिंसा जारी है, और खनिज क्षेत्रों में ‘युद्ध अर्थव्यवस्था’ चल रही है।
- शांति समझौतों के बावजूद बुनियादी ढांचे, रोजगार और सामाजिक विकास में सुधार धीमा है।
- सवाल यह बना हुआ है कि क्या महाशक्तियों की इस होड़ से कांगो के आम नागरिकों को वास्तविक लाभ मिलेगा या देश केवल भू-राजनीतिक स्वार्थों का अखाड़ा बना रहेगा।